Monday, April 06, 2015 10:39:27 PM
         
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अभिमत
 
 
 

अन्यथा

रोहिंग्या पर क्यों रो रहे कर्बला वाले

अनिल विभाकर

 

भारत में अवैध रोहिंग्या घुसपैठियों के समर्थन में आतंकवादी सरगना हाफिज सईद और पाकिस्तान में पनाह लिए अन्य कई आतंकी सरगना खड़े हैं. वे भारत और म्यांमार दोनों को धमका रहे हैं. रोहिंग्या के पक्ष में हाफिज सईद और अन्य आतंकवादियों की तरह भारत के कई विपक्षी दल भी खड़े हैं. इन विपक्षी दलों में कांग्रेस और वामपंथी दल प्रमुख हैं.वे इस मुद्दे पर सरकार की तीखी आलोचना कर रहे हैं. हिंदुस्तान के अधिकतर मौलाना भी रोहिंग्या घुसपैठियों को यहां से न निकालने के लिए सरकार पर दबाव बना रहे हैं. सरहद पार पाकिस्तान में एक मौलवी अशरफ आसिफ जलाली ने रोहिंग्या घुसपैठियों को भारत से निकाले जाने के विरोध में एक रैली की और कहा कि रोहिंग्या हमारे भाई हैं. उनकी हिफाजत के लिए हम एक लाख लोगों की फौज तैयार कर रहे हैं जिसकी लिस्ट पाकिस्तान की सेना को सौंपेंगे. हम मोदी और सू की को उनकी औकात बता देंगे. इसी तरह कोलकाता में भी एक रैली की गई जिसमें मौलाना शब्बीर अली वारसी ने दहाड़ते हुए कहा-ये असम नहीं, ये गुजरात नहीं, यह यूपी नहीं, यह बंगाल है. यहां से रोहिंग्या को कोई निकाल नहीं सकता. मौलाना वारसी यहीं नहीं रुका. उसने धमकी भरे लहजे में कहा-जो उनका कुरान वो मेरा कुरान, जो उनका रसूल वो मेरा रसूल. वे हमारे भाई हैं. दुनिया के मुसलमानों एक हो. जो रोहिंग्या को यहां से भगाना चाहते हैं वे हमारा इतिहास नहीं जानते. हम कर्बला वाले हैं. हम बहत्तर भी होंगे तो एक लाख लोगों का जनाजा निकाल सकते हैं. जरा देखिए, रोहिंग्या के समर्थन में पाकिस्तान में एक लाख लोगों की फौज तैयार की जा रही है और यहां कोलकाता में एक लाख लोगों का जनाजा निकालने की धमकी दी जा रही है. पाकिस्तान से लेकर अपने कोलकाता तक देश की सरकार को जब ऐसी धमकियां मिल रही हों तब तो किसी को भी लगेगा कि मामला बेहद गंभीर है.
भारत सरकार ने रोहिंग्या घुसपैठियों को देश की सुरक्षा के लिए खतरा बताया है. केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि राष्ट्रहित में रोहिंग्या घुसपैठियों को यहां से निकालने का फैसला लिया गया है. विपक्ष रोहिंग्या घुसपैठियों को शरणार्थी बता रहा है मगर सरकार कहती है वे शरणार्थी नहीं, अवैध घुसपैठिये हैं जिनसे देश की सुरक्षा को खतरा है. केंद्र सरकार का कहना है कि रोहिंग्या घुसपैठियों में कइयों के संबंध आईएसआई और आतंकवादी संगठनों से हैं. दरअसल म्यांमार के रखाइन प्रांत में रोहिंग्या अलग देश के लिए हिंसक संघर्ष कर रहे हैं. इनका संगठन है अराकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी जिसे पाकिस्तान और पाकिस्तानी आतंकवादियों का समर्थन प्राप्त है. यह आर्मी म्यांमार में शांतिप्रिय बौद्धों, हिंदुओं और वहां की सेना पर हमले कर रही है. अभी हाल में म्यांमार के रखाइन प्रांत में रोहिंग्या आतंकवादियों ने एक हजार की आबादी वाले एक गांव में हिंदुओं का सामूहिक संहार कर उनकी लाशें दफना दीं. वहां की सेना ने सूचना के आधार पर कुछ स्थलों की खुदाई की तो लगभग पचास हिंदुओं की लाशें निकलीं जिनमें महिलाओं और पुरुषों के साथ ही कई लाशें बच्चों की मिलीं. वे लोग गांव से गायब थे. बताते हैं कि उस पूरे गांव के लोग अब भी लापता हैं. खबर है कि रोहिंग्या आतंकवादी उनमें से बड़ी संख्या में महिलाओं और पुरुषों का जबरन धर्म परिवर्तन कर अपने साथ ले गये हैं. महिलाओं के साथ उन लोगों ने सामूहिक बलात्कार भी किया है. म्यांमार में सुरक्षा बल और सेना ऐसे रोहिंग्या मुसलमानों पर कार्रवाई कर रही है जिसके कारण वे वहां से भारत और बंगलादेश भाग रहे हैं. सरकार के अनुसार भारत में अबतक ऐसे चालीस हजार रोहिंग्या घुसपैठिये हैं जिनसे देश की सुरक्षा को खतरा है. म्यांमार में रोहिंग्या जो हिंसक कृत्य कर रहे हैं, उसे देखते हुए भारत सरकार की आशंका को एक झटके में खारिज करना उचित नहीं होगा. जिनके पक्ष में पाकिस्तान के आतंकी संगठन एक लाख लोगों की फौज खड़ी करने की बात कर रहे हों उन्हें भारत में शरण देना सचमुच खतरे से खाली नहीं.
रोहिंग्या आतंकवादियों ने म्यांमार में हिंदुओं का जिस तरह सामूहिक कत्लेआम किया उसपर भारत में किसी मानवाधिकारवादी, माक्र्सवादी और कांग्रेसी का दिल द्रवित नहीं हो रहा है. मगर यहां अवैध रूप से घुस आये रोहिंग्या की दयनीय हालत दिखाकर वे उन्हें न निकालने के लिए आसमान सिर पर उठाये हुए हैं. हमें तो यही लगता है कि इस मामले में कांग्रेस और वामपंथी दलों का जो रवैया है वह आत्मघाती है. सत्ता में वापसी की आकांक्षा करना कोई बुरी बात नहीं. मगर इसके लिए सही रणनीति होनी चाहिए. रोहिंग्या मुद्दे पर कांग्रेस और वामदल इस समय जिस रणनीति पर चल रहे हैं वह उनके लिए उचित नहीं. उचित इसलिए नहीं है क्योंकि इससे भाजपा और आरएसएस और मजबूत हो रहे हैं. इसके कारण देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और बढ़ रहा है जिससे भाजपा को ही फायदा होगा. मोदी सरकार की विफलताओं को नेपथ्य में करने के लिए लोकसभा चुनाव से पहले जो काम भाजपा और आरएसएस को करना पड़ता वह काम इस समय कांग्रेस, वाम दल, ममता बनर्जी, ओवैसी और यहां के मौलाना कर रहे हैं.
पिछले पांच साल में रोहिंग्या मुसलमानों के पक्ष में भारत में कुछ ताकतें सुनियोजित तरीके से जिस तरह सक्रिय हैं वह गंभीर खतरे का संकेत दे रहा है. बात यह है कि कुछ लोग चाहते यह हैं कि देश में रोहिंग्या घुसपैठियों को मानवाधिकार के आधार पर रहने दिया जाय. जो लोग ऐसा चाहते हैं उन्हें लगता है कि बाद में चलकर तिब्बतियों की तरह ही रोहिंग्या को यहां से कोई निकाल नहीं पायेगा. तिब्बत का मसला तो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की गलत नीतियों के कारण उलझ गया जिसका खामियाजा आज भी भारत को भुगतना पड़ रहा है. वही गलती फिर दुहरायी जाय यह उचित नहीं. पाकिस्तान रोहिंग्या को भारत में इसलिए बसाना चाहता है ताकि उनका उपयोग यहां अलगाववाद और हिंसा फैलाने में किया जा सके. रोहिंग्या घुसपैठियों के मामले में देश के खिलाफ सुनियोजित साजिश हो रही है इसमें कोई संदेह नहीं. हर कोई जानता है कि कश्मीर में देश के अन्य भाग का कोई नागरिक बस नहीं सकता मगर पिछले कुछ सालों में वहां चुपके-चुपके लगभग 14 हजार रोहिंग्या मुसलमान बसा दिये गये. कश्मीर से मार कर भगा दिये गये चार लाख कश्मीरी पंडितों की जब वापसी की बात होती है तो कश्मीर के अलगाववादी नेता बवाल मचाने लगते हैं. मगर रोहिंग्या मुसलमानों के लिए मानवाधिकर कार्यकत्र्ता सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गये. ऐसे मानवाधिकारवादियों में सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण प्रमुख हैं. यह वही प्रशांत भूषण और उनकी वही मंडली है जिसने आतंकवादी याकूब मेमन को फांसी से बचाने के लिए आधी रात में सुप्रीम कोर्ट की अदालत लगवायी थी. संक्षेप में रोहिंग्या घुसपैठियों के साथ जब हाफिज सईद जैसे अलगाववादी लोग खड़े हैं उससे तो यही लगता है कि रोहिंग्या देश के लिए खतरा हैं और उन्हें यहां से बाहर निकाला ही जाना चाहिए. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)

 
 
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