Monday, April 06, 2015 10:39:27 PM
         
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नीतीश ने ओढ़ी ऐसी चादर

 

बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू करने के बाद इस साल 2 अक्तूबर को नीतीश सरकार ने बाल विवाह और दहेज प्रथा से मुक्ति का महाअभियान शुरू किया. ऐसे विवाह रोकने और उसमें शामिल न होकर उसका विरोध करने के लिए मुख्यमंत्री ने पटना के एक समारोह में 5000 लोगों को शपथ दिलायी. एक गंभीर सामाजिक मुद्दे पर नीतीश कुमार की यह बड़ी राजनीतिक पहल है.
   1950 में दहेज निषेध कानून सबसे पहले बिहार में लागू हुआ था. इसके 11 साल बाद 1961 में संसद ने दहेज प्रथा के विरुद्ध कानून बनाया. इस कानून को न तो समुचित सामाजिक स्वीकृति मिली और न जनता के विरोध की आशंका से सहमी सरकारों ने कभी इसे लागू कराने में सख्ती बरती. जब सरकार और प्रशासन का शीर्ष नेतृत्व ही दहेज निषेध कानून की भावना से सहमत न हो, स्वयं दहेज लेता और देता हो, तब ऐसे कानून का लागू होना स्वयं संदिग्ध था. दहेज लेने-देने का चलन न केवल बढ़ता गया, बल्कि कन्यापक्ष से मनवांछित धनराशि जबरन वसूलने के लिए बहुओं को प्रताड़ित करने या क्रूरतापूर्वक मार डालने की घटनाएं भी बढ़ने लगीं.
दहेज निषेध कानून बनने की आधी सदी बाद 2015 में 1154 लड़कियां केवल इसलिए मार डाली गयीं कि उनके माता-पिता दहेज की मनमानी मांगों को पूरा नहीं कर पाये. देश में होने वाली दहेज हत्याओं में 15 फीसद घटनाएं अकेले बिहार में होती हैं. उत्तर प्रदेश के बाद बिहार में सबसे ज्यादा बहुएं दहेज के चलते मारी जाती हैं. आज केवल पटना में दहेज प्रताड़ना के 300 मामले दर्ज हैं. दहेज की चाहत इतनी गहरी है कि प्रेम विवाह के 25 प्रतिशत मामलों में भी कुछ दिन बाद दहेज के लिए बहू को तंग किया जाने लगता है. पढ़ी-लिखी और नौकरी-पेशा लड़कियों के परिवार को भी इस समस्या की सुरसा ने नहीं बख्शा है. विडंबना यह कि दहेज विरोधी कानून या तो किताबों में पड़े रहे या उनके दुरुपयोग के मामले सामने आये. एक और विसंगति देखने को मिली. जो परिवार जितना सम्पन्न और पढ़ा-लिखा होता है, उसमें दहेज की मांग भी उतनी ज्यादा होती है.
5 अक्तूबर 2017 को पटना पुलिस ने दहेज प्रताड़ना के आरोप में नालंदा निवासी जिस शख्स को जमशेदपुर से गिरफ्तार किया, वह कोई कम पढ़ा-लिखा व्यक्ति नहीं, बल्कि निजी अस्पताल में कार्यरत एमबीबीएस डाक्टर था. साल भर पहले शादी हुई थी. 10 लाख रुपये की मांग शुरू हो गयी और इसके लिए नवब्याहता पत्नी को सिगरेट से जलाकर प्रताड़ित किया जाने लगा था. दहेज की बढ़ती लिप्सा साबित करती है कि हमारी शिक्षा प्रणाली बेहतर मनुष्य बनाने में विफल रही.
ज्यादा पढ़े-लिखे लोग दहेजलोभी
राज्य के अन्य जिलों के मुकाबले पटना जिले में साक्षरता दर सबसे ज्यादा है. यहां 2015 में सबसे ज्यादा 104 बहुएं दहेज की मांग पूरी न होने के कारण मार डाली गयीं. उसी वर्ष कम साक्षरता वाले जमुई, कटिहार में 10-10, तो मुंगेर, लखीसराय और नवगछिया में मात्र 7-7 बहुओं को जान गंवानी पड़ी थी. 62 दहेज हत्याएं अपने नाम लिखाने वाला वैशाली जिला दूसरे स्थान पर था. वैशाली को गणतंत्र की भूमि बताकर महिमा दी जाती है.
दो साल पहले मुख्यमंत्री के गृह जिला नालंदा में 54 और मुजफ्फरपुर जिले में 53 बहुएं दहेज हत्या का शिकार हुईं थीं. इस शर्मनाक आंकड़े के बावजूद यदि कोई समाज इतिहास के पन्नों से बुद्ध-महावीर और सम्राट अशोक या मंडन मिश्र को सामने रख कर आज के बिहार गौरव की बात करता है, तब वह स्वयं को धोखा देने की कोशिश ही करता है.
लिव-इन रिश्तों का चलन बढ़ा
अंधेरे में रोशनी की लकीर यह कि महिला सशक्तीकरण के राजनीतिक-प्रशासनिक- सामाजिक प्रयासों के फलस्वरूप एक तरफ दहेज हत्या की घटनाओं में 15 फीसद की कमी आयी, तो दूसरी तरफ इस कुप्रथा से बचने के लिए लड़कियां आत्मनिर्भर होने के बाद ही विवाह करने पर जोर देने लगीं. विवाह वेदी के सप्त-वचन उन्हें सात जन्म क्या, एक जन्म भी राजी-खुशी साथ बिताने का भरोसा नहीं दिला पा रहे हैं. घरेलू हिंसा के भयावह आंकड़े लड़कियों को सावधान कर रहे हैं.
इसका साइड-इफेक्ट सबसे ज्यादा महानगरों में दिख रहा है. परंपरा (दहेज-दिखावा) में बुरी तरह जकड़ी विवाह व्यवस्था की घुटन में जीने की बजाय आर्थिक रूप से सक्षम लड़कियां लिव-इन रिश्ते के खुलेपन में रहना पसंद कर रही हैं. हममें से अनेक लोग भले ही इसे नापसंद करें, लेकिन देश के सर्वोच्च न्यायालय ने लिव-इन रिश्ते को पर्याप्त कानूनी सुरक्षा प्रदान कर विवाह बाजार में वैकल्पिक उत्पाद लांच कर दिया है.
आज प्रतियोगी परीक्षाओं में लड़कियों की भागीदारी लगातार बढ़ रही है. हाई स्कूल-इंटर पास कर विवाह करने वाली लड़कियों की संख्या घटी है, लेकिन पारंपरिक मानसिकता के दबाव के विरुद्ध खड़ा रहने में उन्हें अब भी काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. आये दिन खबरें आती हैं कि परिवार लड़कियों पर पढ़ाई अधूरी छोड़कर शादी करने लेने के लिए दबाव बना रहा है. इसे सामाजिक पहल से ही रोका जा सकता है.
बाल विवाह के खिलाफ जगा समाज
बाल विवाह के विरुद्ध राज्य सरकार के अभियान की घोषणा के 4 दिन बाद लालगंज (वैशाली) में 14 साल की गुड़िया की शादी शरद पूर्णिमा पर (6 अक्तूबर) हाजीपुर के मनीष कुमार से होने वाली थी. गुड़िया ने आगे पढ़ाई करने और दुल्हन न बनने की जिद की. जब यह बात फैली, तो ग्रामीणों ने गुड़िया का साथ दिया, रूढ़ीवादी परंपरा का नहीं. शादी टल गयी. यह सरकार के औपचारिक जागरूकता अभियान की पहली सफलता थी. फलका (कटिहार) और सिंहेश्वर (मधेपुरा) में भी ग्रामीणों ने सक्रियता दिखाकर दो नाबालिग लड़कियों की शादी नहीं होने दी. बाल विवाह के विरुद्ध जनमानस बनने लगा है.
भारतीय समाज में विवाह अपनी जटिलताओं और सोच की जकड़न के कारण बोझिल साबित होने लगे हैं. चोट के निशाने पर लड़कियां हैं, इसलिए बहुत से समाज दहेज संबंधी मुसीबतों का आकलन कर लड़की पैदा करने से बचने लगे हैं. अगर लिंगानुपात असंतुलित हो रहा है, तो केवल भू्रण हत्या पर कानूनी शिकंजा कसने से काम नहीं चल सकता. दहेज के प्रति आग्रह छोड़े बिना लड़कियों के जन्म को उत्सव में नहीं बदला जा सकता.
लड़का-लड़की की समानता के प्रगतिशील नारे विवाह की बेदी पर दम तोड़ देते हैं. रिश्ते की बात ही शुरू होती है लेन-देन से. लड़की वाले को नीची निगाह से देखना और उससे बड़ी धन राशि दहेज में पाने की चाहत करना आम बात है. अगर लड़के वालों से भी ऐसी अपेक्षा की जाये, तो उन्हें कैसा लगेगा? अगर लड़के वालों से ऐसी अपेक्षा नहीं की जाती, तो फिर लड़का-लड़की समान कहां रह गये? लड़कियां खुद को तब तक समान स्तर पर नहीं पा सकतीं, जब तक वे आत्म निर्भर होकर विवाह की शर्तें खुद तय नहीं करतीं.
हैसियत दिखाने की चाहत
दहेज की जानलेवा प्रथा एकतरफा मांग के बूते नहीं फली-फूली है. सम्पन्न कन्या-परिवारों के लिए बढ़-चढ़ कर दहेज देना सामाजिक-आर्थिक हैसियत के सार्वजनिक प्रदर्शन का ऐसा इवेंट बन चुका है, जिसके जरिये वे अपने आस-पास के गरीब परिवारों का उपहास करते हैं. कितना दहेज मिला? या कितने में शादी तय हुई? - ये सवाल किसी का वेतन, आमदनी या जाति पूछने जैसी सामाजिक असभ्यता है, लेकिन बिहार-यूपी में (जहां सबसे ज्यादा दहेज हत्याएं होती हैं) कोई इसका बुरा नहीं मानता. यह सामंती सोच बदलनी पड़ेगी.
आशा की जानी चाहिए कि नीतीश कुमार अपने सामाजिक मिशन में कामयाब होंगे. हालांकि, सत्ता का अंधविरोध विपक्ष की विश्वसनीयता को संदिग्ध बनाता है, फिर भी मुख्य विपक्षी दल राजद और कांग्रेस के नेता नीतीश कुमार की इस पहल का विरोध कर रहे हैं. वे दहेज प्रथा के परोक्ष समर्थन वाले बयान दे रहे हैं.
लालू-मुक्त सरकार के 64 दिन
लालू-प्रभाव से मुक्त होने के बाद 64 दिनों में नीतीश सरकार कई मुद्दों पर अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पायी. कानून-व्यवस्था में ऐसा सुधार नहीं हुआ जिसे महसूस किया जा सके. 26 सितंबर को पूर्वी चंपारण जिला के ढाका विधानसभा क्षेत्र से राजद विधायक फैसल रहमान से 15 दिन के भीतर दूसरी बार 20 लाख रुपये की रंगदारी मांगी गयी. उसी दिन राजधानी के दवा व्यवसायी शंभु शरण से 1 करोड़ रुपये की रंगदारी न मिलने पर खुसरुपुर स्थित उनके गांव में अपराधियों ने दहशत फैलाने के लिए 20 राउंड फायरिंग की और उनके प्लाट की चहारदिवारी तोड़ दी.
बढ़ते अपराध के खिलाफ राजधानी के निकट मसौढ़ी में बाजार बंद कराकर सड़क जाम की गयी. एक दिन पहले 25 सितंबर को बरौनी (बेगूसराय) में बैंक की एक शाखा से 20 लाख रुपये लूट लिये गये. ये घटनाएं कानून-व्यवस्था की उच्च स्तरीय समीक्षा के चार दिन बाद हुईं. 21 सितंबर की समीक्षा बैठक में मुख्यमंत्री ने कहा था कि अगर अपराध बढ़े, तो पूरे थाने पर कार्रवाई होगी. ये निर्देश कोई असर नहीं दिखा पाये.
उद्घाटन से पहले टूटा बांध
कहलगांव में 19 सितंबर को बटेश्वर स्थान गंगा पंप नहर परियोजना का बांध उद्घाटन से 17 घंटे पहले ही टूट गया, जिससे सरकार की काफी किरकिरी हुई. मुख्यमंत्री को अचानक कार्यक्रम रद्द करना पड़ा. विपक्ष को आक्रामक होने का मौका मिला. जिस परियोजना पर 38 साल में 828.80 करोड़ रुपये खर्च हुए, उसका इस तरह ध्वस्त हो जाना निर्माण और विकास कार्यों में नेता-इंजीनियर-ठेकेदार की मिलीभगत से होने वाली महालूट को एक बार फिर उजागर कर गया. अंग्रेजीराज के पुल, बांध, स्कूल-भवन और सड़क-जैसे सार्वजनिक निर्माणों में जो गुणवत्ता होती थी, वह आजादी के बाद राजनीतिक संरक्षण में पलने वाली कमीशनखोरी के चलते समाप्त हो गयी. राजनीतिक साथी बदल-बदल कर पिछले 12 साल से सत्ता में रहने के बावजूद नीतीश कुमार इस अवधारणा को नहीं तोड़ पाये.
इस अपराध के लिए उम्रकैद या फांसी जैसी सजा होनी चाहिए थी, लेकिन अपराध में लिप्त प्रभावशाली वर्गों ने न कभी ऐसा होने दिया, न इसकी कोई संभावना दिखायी पड़ती है. सिर्फ सत्ता का चेहरा बदलता है, चरित्र नहीं. संसाधन की कमी बताने वाली या संसाधन के लिए जनता पर भारी कर थोपने वाली सरकारें जब करोड़ों रुपये के भ्रष्टाचार नहीं रोक पातीं, तब क्या उन्हें शासन करने का नैतिक अधिकार रह जाता है?
नौकरी देने में नाकामी
बिहार सरकार रोजगार के नये अवसर बनाना तो दूर, उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं को स्वीकृत पदों पर नौकरी
देने के मोर्चे पर भी विफल रही. विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के लगभग 9 हजार पद सालों से खाली पड़े हैं. सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कालेजों में स्पेशलिस्ट डाक्टरों के 72 फीसद पदों पर नियुक्तियां नहीं हो पायीं. स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव आर के महाजन ने हाई कोर्ट में जवाबी हलफनामा दायर कर स्वीकार किया कि हृदय रोग, नाक-कान-गला, अस्थिरोग और न्यूरोलाजी जैसे कई विभागों में विशेषज्ञ चिकित्सकों के 2,775 पद स्वीकृत हैं, जबकि इन पदों पर केवल 782 डाक्टरों की नियुक्ति हो पायी. चिकित्सा विज्ञान और नर्सिंग के छात्रों को पढ़ाने के लिए 8,000 प्रोफेसरों के पद भी खाली पड़े हैं. दूसरी तरफ नये मेडिकल कालेज खोलने के सपने दिखाये जाते हैं.
चिकित्सा, शिक्षा, कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक निर्माण जैसे कई क्षेत्र हैं, जिसमें नीतीश सरकार की कार्यक्षमता एनडीए-1 जैसी नहीं दिखती. अगर इन विफलताओं पर रेशमी पर्दा डालने के लिए राज्य सरकार बाल विवाह और दहेज प्रथा जैसे पुराने मुद्दों पर अचानक बेहद संवेदनशील हो गयी है, तो इसकी नीयत पर सवाल उठेंगे ही.

 
 
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