Monday, April 06, 2015 10:39:27 PM
         
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अभिमत
 
 
 

बात बेबात

आचार्य किशोर 

ये चैकी खोर मंत्री
गांव से जुड़े लोग याद कर सकते हैं. सामाजिक उत्सवों में एक नाच होता था-चैकी तोड़ नाच. इसमें गांव के कलाकार ही हिस्सा लेते थे. किसान, मजदूर और बेरोजगार नौजवान रात भर ग्रामीणों का मनोरंजन करते थे. शहरों की तरह आज भी ग्रामीण इलाके में नाच-तमाशा के लिए स्थायी मंच नहीं है. ये मंच उन दिनों में भी नहीं थे. ढेर सारी चैकियों को जोड़कर मंच का निर्माण होता था. चैकी का इंतजाम गांव के लोग ही करते थे. नाच के दौरान संवाद को अधिक प्रभावपूर्ण बनाने के लिए पात्र जोर-जोर से पैर पटकते थे. इस प्रक्रिया में कमजोर चैकी टूट जाती थी. इसी से नाच का नाम ही चैकी तोड़ पड़ गया. खैर, यह गुजरे जमाने की बात है. आज गांव में चैकी कौन देगा और कौन इसे तोड़ेगा. लेकिन, सुशासन बाबू के एक मंत्री राजधानी में इस परम्परा को कायम रखे हुए हैं. मंत्रीजी मिथिलांचल के हैं. अपना घर शहरी क्षेत्र में है. विधानसभा क्षेत्र देहात में है. परिचित लोग बताते हैं कि इन्होंने कभी चैकी तोड़ नाच में पात्र की भूमिका नहीं निभायी. नाच देखा भी कि नहीं, दावे के साथ कोई नहीं कह सकता है. इधर, जबसे मंत्री बने हैं, मालदार मुलाकातियों से चैकी की मांग तेजी से कर रहे हैं. कोई आदमी किसी मालदार को लेकर पैरवी के लिए पहुंचता है. इधर-उधर की बात करके मंत्रीजी सीधे मूल विषय पर पहुंच जाते हैं-महंगाई बढ़ गयी है. वेतन से क्या होता है? खुद इस सवाल का जवाब भी दे देते हैं-कुछ नहीं होता है. हमको देखिये. वेतन का सारा पैसा जनता की खातिरदारी में चला जाता है. खाद्य की तो आपूर्ति हो जाती है. मगर, जनता को जमीन पर सुलाना अच्छा नहीं लगता है. साल भर से सोच रहे हैं कि आठ-दस चैकी खरीद कर जनता के लिए रख दें. हो नहीं पा रहा है. मंत्रीजी की गरीबी पर कोई-कोई मुलाकाती तरस खा जाता है. कह देता है कि हम चैकियां भिजवा देंगे. कितना भेजवा दें? आठ या दस. मंत्रीजी विनम्रता से कह देते हैं कि चैकियों का तो एडवांस दिया हुआ है. आप पीए साहब को रुपया ही दे दीजिये. पीए को रुपये का भुगतान हो जाता है. यह भांडा फूटता नहीं. गलती मंत्रीजी से ही हो गयी. एक ही क्लाइंट के सामने उन्होंने दूसरी बार चैकी समस्या का जिक्र कर दिया. पहली मुलाकात में ही वह आदमी डेढ़ हजार की दर से दस चैकियों का भुगतान कर चुका था. मंत्रीजी आदतन उसके सामने रटा रटाया डायलाॅग बोल गये. बहरहाल, उनके आवास पर जनता के लिए चार-पांच चैकी उपलब्ध है. खैराती चावल का भात मिल जाता है. सतर्क जनता गांव से चलती है तो बाड़ी से हरी सब्जी लेते आती है. इससे मंत्रीजी का भी काम चल जाता है. वाजिब ही है. सुशासन बाबू ने रिश्वतखोरी पर इतनी सख्ती बरती है कि बेचारे मंत्रियों को वेतन से ही गुजारा करना पड़ता है.


ऐसे बढ़ रहा मुकदमा
सरकार ताज्जुब कर रही है कि उसके हरेक फैसले को कोर्ट में चुनौती क्यों दे दी जाती है. नतीजा यह है कि हाई कोर्ट में मुकदमों की संख्या बढ़ती ही जा रही है. इसके चलते खजाने पर बोझ पड़ता है. बदनामी होती है. उधर न्यायपालिका से जुड़े लोग अलग चीखते रहते हैं कि मुकदमों का भार अब सहन नहीं हो रहा है. आखिर मुकदमें बढ़ क्यों रहे हैं. एक बानगी से समझिये. सरकार के कई महकमों में ठेका पर काम होता है. ऐसे ही एक विभाग की यह कहानी है. एक ठेकेदार नियमित रूप से मंत्री को उपकृत करता था. उसने विभाग के एमडी की कद्र नहीं की. एक दिन एमडी ने उसे तलब किया. अपना पावर बताया. यह भी बता दिया कि हम सबसे पावरफुल हैं. हम काट लें तो मंत्री भी नहीं बचा सकते. ठेकेदार ने अनसुनी कर दी. अगले दिन उसे फल मिल गया. सब जगह से पास होकर आया बिल एमडी की जांच में फेल हो गया. ठेकेदार को गलती का अहसास हुआ. वह दौड़ा-भागा एमडी के पास आया. स्वीकार किया कि असली पावर एमडी के पास ही है. उसने पहली किस्त का भुगतान भी कर दिया. उधर, मंत्री की मासिक किस्त रोक दी गयी. मंत्री ने कई बार ठेकेदार तक संवाद भिजवाया-भैया, आकर मिल तो लो. ठेकेदार ने ध्यान नहीं दिया. मंत्री आ गये गुस्से में. उन्होंने अपना पावर दिखा दिया. अपने जिले के एक अधिकारी से ठेकेदार की एजेंसी पर प्राथमिकी दर्ज करवा दी. इसी आधार पर ठेकेदार की कंपनी को ब्लैक लिस्टेड करने का आदेश एमडी ने दे दिया. ठेकेदार एक बार फिर एमडी की शरण में आया. उसे सलाह दी गयी कि ब्लैक लिस्टेड करने के सरकार के आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट चले जाओ. हम विरोध नहीं करेंगे. अंततः एक और मामला रिश्वतखोरी के चलते कोर्ट में चला गया. बताते हैं कि इसी प्रक्रिया से मुकदमों की संख्या बढ़ती जा रही है. सरकार चाहे तो जांच करा ले, उसके जिस विभाग के मंत्री और अफसर आपसी रजामंदी से लूटपाट नहीं करते हैं, उस विभाग में मुकदमों का अंबार लग जाता है.


खुश हुए तो डांट खा गये
जनता उन्हें दो विधानसभा चुनावों से खारिज कर रही है. पार्टी पर भतीजे का कब्जा हो गया है. भतीजा के सक्रिय राजनीति में आने से पहले कोठी में उन्हें छोटे साहब का दर्जा हासिल था. यह ऐसा सम्मानजनक पद था, जिसपर मंत्री-विधायक रहें न रहें, उनका एकाधिकार था. इधर, जबसे भतीजे की धमाकेदार इंट्री हुई, पार्टी के साथ उसने छोटे साहब का दर्जा भी हथिया लिया. उनके प्रति सम्मान प्रकट करने वालों के सामने संकट था. किस नाम से पुकारें. कुछ लोगों ने उन्हें मंझला साहब कहना शुरु किया. इस बेतुके संबोधन से वह बुरी तरह झल्ला गये. इस नाम से संबोधित करने वाले एक शख्स को उन्होंने मोटी गाली दी-पता करो, साहबों के घराने में झांक कर देख लो. कहीं मंझले साहब हुए हैं क्या? बोरिंग रोड वाले साहब भवन में भी दो ही साहब हुए. बड़े और छोटे. इधर, एक अणे मार्ग में नये छोटे साहब का उदय हुआ है. सुशासन बाबू, जिन्हें साहब कहा जाता था, बड़े साहब हो गये. छोटे साहब का ओहदा भगवानजी को दे दिया गया है. खैर, बहुत दिनों से अनाम चल रहे भूतपूर्व छोटे साहब को नया नाम मिला-मंत्रीजी. खुशी की बात थी. बिना किसी सदन के सदस्य हुए मंत्री बन जाना सचमुच खुशी की बात है. वह खुश हुए. लेकिन, इसी खुशी के मारे सुशासन बाबू से डांट भी खा गये. हुआ यह कि सुशासन बाबू ने उनके नाम की सिफारिश विधान परिषद की सदस्यता के लिए कर दी. सिफारिश के दिन मंत्रीजी अपने प्रभार वाले जिले के दौरे पर थे. शाम में बुलावा आया. तुरंत पहुंचे. उन्हें समझाया गया कि कल चुपचाप विधान परिषद की मेंबरी की शपथ ग्रहण कर लें. किसी से चर्चा नहीं करें. बात बाहर निकलेगी तो कोई आदमी कोर्ट-कचहरी का चक्कर लगा देगा. मंत्रीजी ने भरोसा दिया कि ऐसा ही होगा. भरोसा देकर वह घर चले आये. मगर, खुश इतने थे कि दरबारियों को बता दिया. कल एक और ओथ लेना है. किसी दरबारी ने यह खबर मीडिया को लीक कर दी. चैनल पर चलने लगा. बस, तुरंत एक अणे मार्ग से फोन आया-बर्दाश्त नहीं हो रहा है न. झेलियेगा. सचमुच वही हुआ. ओथ लेने के अगले ही दिन उनके मनोनयन का मामला हाई कोर्ट पहुंच गया. मंत्रीजी का बीपी बढ़ा हुआ है. इस हादसे के लिए वह खुद को जिम्मेवार नहीं ठहरा रहे हैं. मांझीजी को जिम्मेवार ठहरा रहे हैं, जिनकी नैया बीच भंवर में फंसी हुई है.


वैष्णव घर
ये मन में लालसा न हो न, तो आदमी कुछ नहीं कर पाता है. देखिये, एक कार्यकत्र्ता विधायक बनने के लिए क्या कुछ करता है. टिकट लेने के लिए पार्टी के नेता से ढेर सारा वादा करता है. नकद नारायण का सहारा लेता है. टिकट मिल गया तो जनता से वादा करता है कि एक बार ठंडे घर में भेज दीजिये. क्षेत्र का विकास करेंगे. नहीं करेंगे तो मुंह नहीं दिखायेंगे. जनता जोश में आकर वोट दे देती है. अगला पड़ाव मंत्री बनने का होता है. विधायकजी मंत्री बन जाते हैं. अमूमन इतना सबकुछ हरेक मंत्री के साथ होता है. इसके बाद एक अदद बंगला चाहिये. यहां आकर लालसा कुछ और की होने लगती है. मसलन, उत्तर बिहार के एक भाजपा विधायक अचानक मंत्री बन गये. देखिये बंगला को लेकर उनके मन में क्या सब चला. क्योंकि उनकी गिनती छोटे मोदी के करीबी के तौर पर होती है, इसलिए उन्हें इस बात की आजादी थी कि खाली होने वाले पूर्व मंत्रियों के बंगले में से किसी एक का चुनाव कर लें. खाली बंगलों की लिस्ट उनके हाथ में थी. खुद मुआयना पर निकले. एयरपोर्ट के आसपास एक भव्य बंगले पर उनकी नजर पड़ी. चालू भाषा में कहें तो उन्होंने उस बंगले पर अपना हाथ धर दिया. हाथ धरने भर की देर थी, बंगले का अलाटमेंट उनके नाम पर हो गया. खुशी-खुशी घर लौटे. अगली यात्रा में सपत्नीक बंगला देखने आये. शानदार बंगला था. पत्नी को भी पसंद आ गया. मैडम ने पूछा कि अभी इस बंगले में कौन रह रहे हैं. एक पूर्व मंत्री का नाम बताया गया. नाम सुनते ही मैडम बिदक गयीं. बोली कि कोई दूसरा बंगला देखिये. हम इसमें हरगिज नहीं रहेंगे. क्यों भाई! इसलिए कि पूर्व मंत्रीजी वैष्णव नहीं हैं. उनकी रसोई में मांसाहार भी बनता रहा होगा. मंत्रीजी ने समझाया कि पूजा-पाठ करेंगे. जहां तहां से गंगाजल मंगवायेंगे. हवन करायेंगे. बंगला शुद्ध हो जायेगा. मैडम नहीं मानी. खैर, उन्हें यह नहीं बताया गया लंबे समय तक इस बंगले का इस्तेमाल विवाह घर के लिए भी हुआ है. मांस-मदिरा क्या, उससे आगे नाच-गाना भी हुआ होगा. इस बड़े बंगले को खारिज करने के बाद मैडम को कुछ और बंगला दिखाया गया. सबको मांसाहार के नाम पर खारिज कर दिया गया. अंत में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी के नाम पर आवंटित बंगले को पसंद किया गया. मैडम को बताया कि यह पूरी तरह से वैष्णव भवन है. इसमें रहनेवाले अधिकारी पूर्ण वैष्णव थे. मंत्रीजी के नाम से वही बंगला अलाट कर दिया गया है. गृह प्रवेश की तैयारी चल रही है.


आशा का संचार
आपने जीवन से निराश लोगों की जिन्दगी में आशा का संचार करने वाले लोगों के लिए कई तरह के इश्तिहार देखे होंगे. वैद्य, हकीम से लेकर टोना-टोटका करने वाले लोग इस तरह का इश्तिहार देकर निराश लोगों में आशा का संचार करा देने का दावा करते रहते हैं. हालांकि, अक्सर ऐसे दावे मर्दाना कमजोरी दूर करने के लिए किये जाते हैं. मगर माना यह गया है कि मन में आशा का संचार हो जाये तो दूसरी कमजोरियां भी खत्म हो जाती हैं. हाल के दिनों में आशा का संचार करने वाले दूसरे नुस्खे भी आ गये हैं. अलग बात है कि इसका फायदा किस्मत वालों को ही मिलता है. मौजूदा सरकार के एक मंत्री हैं. विधायक का चुनाव लड़ रहे थे तो मतदाताओं ने इस उम्मीद मंे उन्हें वोट दिया कि बेचारे जल्द ही सीट खाली करके परलोक सिधार जायेंगे. नौजवान कार्यकत्र्ताओं ने भी इस उम्मीद में मदद की कि उपचुनाव में टिकट की मांग करेंगे. अभी इनकी आखिरी इच्छा पूरी होने देते हैं. विधायक बने. मंत्री बनते ही उनके मन में इस स्तर का आशा का संचार हुआ कि अगले चुनाव की तैयारी में अभी से जुट गये हैं. ये साहब मिथिला के हैं. नया मामला देखिये. ये ताजा फेरबदल में मंत्री बने हैं. उम्र अधिक नहीं है. लेकिन, पावर की बुरी आदतों का शिकार होकर बीमार रहने लगे हैं. डाक्टरी सलाह पर ज्यादा समय खाट ही पकड़े रहते थे. रात तो सोने के लिए है. इनके दिन का ज्यादा वक्त भी सोने में ही गुजरता था. मंत्री बने तो आशा का संचार हुआ. दरबारियों ने सलाह दी कि सैर कीजिये. तबीयत हरी रहेगी. सलाह पर अमल करने के लिए राजी हो गये. चप्पल पहन कर अपने आवास परिसर में ही टहलने की कोशिश की. पहले दिन चार कदम चले होंगे कि हांफने लगे. दरबारियों ने उठाया. कहा कि स्पोर्टस शू पहनिये. उन्होंने ऐसा ही किया. मुश्किल जूता पहनने को लेकर पैदा हुई. कमजोरी के चलते खुद से जूता नहीं पहन पाते हैं. यह काम कोई दरबारी कर देता है. असर है. अब पांच मिनट तक लगातार सैर कर लेते हैं. उनके सैर के वक्त आवास परिसर में जहां-तहां कुर्सियां लगा दी जाती हैं. ताकि कमजोरी महसूस हो तो दूर न जाना पड़े. जहां दम फूला, वहीं कुर्सी पर बैठ जायें. उनका सैर जारी है. पांच मिनट सैर, दस मिनट विश्राम. इस प्रक्रिया में वह आधे घंटे तक मैदान में डटे रहते हैं. मतलब दस मिनट सैर करते हैं. बीस मिनट आराम करते हैं. इसका अच्छा असर उनकी सेहत पर पड़ रहा है. चेहरे पर रौनक आ रही है. लेकिन, विभाग के एक तरह से बांझ रहने के कारण चिन्ता से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं.


सुरक्षा कवच
मानना पड़ेगा कि कानून बनाने वाले से अधिक चालाक इसे तोड़नेवाला होता है. कानून कितना ही कड़ा हो, उसे तोड़ने का उपाय ढूंढ़ ही लिया जाता है. अब शराबबंदी के कानून को ही लीजिये. सुशासन बाबू रोज अपना गुणगान कर रहे हैं. शराब के कारोबारियों को पुलिस पकड़ रही है. मुकदमे हो रहे हैं. इसके बावजूद कारोबार बेखटक चल रहा है. गली मोहल्ले वाले लोग चुपके से खरीद कर घर में पी लेते हैं. लेकिन, एलीट क्लास के लोग कैसे चुपचाप पीकर पड़ जायें. शराब का मजा तो पार्टियों में ही है. तो एलीट क्लास के कुछ लोगों ने बंदी में शराब की पार्टी का नायाब बंदोबस्त कर लिया है. राज्य सरकार के कई बड़े अधिकारी शराब के शौकीन हैं. पुलिस के एक बड़े अधिकारी तो इतने शौकीन हैं कि उनके रग-रग में अल्कोहल का निवास हो गया है. संयोग से पुत्र भी उन्हीं के रास्ते पर चल पड़े हैं. चल क्या पड़े हैं, समझ लीजिये कि उनसे काफी आगे निकल चुके हैं. पुत्र की मंडली है. जाहिर है, इस मंडली में छोटी हैसियत वाले लोग नहीं हैं. बड़े-बड़े लोगों की संताने हैं. शराबखोरी के लिए मंडली की बैठक अलग-अलग जगहों पर होती है. कुछ दिन पहले तक बोरिंग रोड का एक रेस्टोरेंट इसके लिए सबसे मुफीद जगह मानी जाती थी. इधर, पार्टी का आयोजन नये अंदाज में हो रहा है. एक समूह के ढेर सारे सदस्य हैं. उनकी ओर से पार्टी का आयोजन किया जाता है. इन पार्टियों की शत्र्त यही है कि चीफ गेस्ट के तौर पर उन्हीं बड़े पुलिस अफसर के बेटे को बुलाया जाता है. वह आ गये तो पार्टी फुल मस्ती में चलने लगती है. खूबी की बात यह है कि जिस पार्टी के चीफ गेस्ट साहबजादे रहते हैं, उस पार्टी की सूचना स्थानीय थाना को दे दी जाती है. ताकि धोखे से किसी पड़ोसी ने उत्पाद विभाग को जानकारी दे दी तो उसका दस्ता भी पार्टी में खलल डालने की हिम्मत न कर सके. पार्टी के बाद सभी अतिथियों को घर तक पह

 
 
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