Monday, April 06, 2015 10:39:27 PM
         
परिचय
विज्ञापन
प्रसार
अभिमत
 
 
 

तिरछी नजर

आज का फेसबुकिया समाज

 

फेसबुक आज की मांग है, जरूरत है... पूर्ति है. फेसबुक मनोरंजन है, फोटोरंजन है... प्यार है, तकरार है. लाइक, डिसलाइक (चुप्पी) तथा कमेंट का खुला मंच है. सुख-दुख की अभिव्यक्ति है. शुभकामनाओं और बधाइयों का भंडार है. इसमें गांव-कस्बा, शहर के साथ घर बैठे सारा संसार है. कवियों-लेखकों की यह पहली पसंद है. रूपवतियों, गुणवतियों तथा युवतियों का साम्राज्य है यहां. प्रदर्शनी का फोकटिया इंतजाम तथा विज्ञापन की पूरी छूट है यहां...!
मेरे मुख से ‘मुखपोथी’ की विशिष्टता सुनने के पश्चात मेरे एक प्रगतिवादी, गरीबवादी साहित्यकार मित्र का कहना था कि इसमें सब कुछ है, पर फेस के साथ बुक गोल है. और ‘फेस’ है कि ‘फेक’ है, यह किसे पता? चेहरे का क्या भरोसा, जहां आदमी का ही कोई भरोसा नहीं. इसीलिए हमारे मित्र राजेश खन्ना जी गाते-समझाते चल दिये कि चेहरा न देखो चेहरे ने लाखों को लूटा... दिल सच्चा और चेहरा झूठा... . हां, यहां जरा टोकूंगा. उन्होंने थोड़ा रुकते हुए आगे कहा-लेकिन अब दिल भी सच्चा नहीं रहा. दिल में दाग है. फेस पर फफोले हैं. तो, फेसबुक ‘फेकबुक’ भी नहीं सिर्फ ‘फोटोबुक’ ही है न! या ‘फेस-वाॅश’ कह लीजिये.
आपने तो फेसबुक की बखिया उधेड़ दी मित्र. उन्होंने छूटते हुए जवाब दिया-जो है मैंने वही कहा भाई. खुद का कहां कुछ जोड़ा. देखिये न, अपने प्रधानसेवक जी कैसे अपना चेहरा बदल-बदल कर जुमला बदलते रहते हैं और सुननेवाले का चेहरा अच्छे दिन की उम्मीद में खिल-खिल उठता है कि तभी विरोधी का चेहरा पब्लिक से कह उठता है-चेहरा क्या देखते हो, दिल में उतर के देखो न! लेकिन दिल तो ‘सील’ है, उतरे कैसे? इधर, पब्लिक को भी फेस-फोबिया परेशान किये हुए है. वह प्रधानसेवक के लिए गुनगुनाती है-तेरे चेहरे से नजर नहीं हटती, नजारे हम क्या देखें! इसलिए न अबकी राजनीति ‘विचार’ से नहीं, ‘फेस’ से चलती है. जैसे फेसबुक पर फेस की ही प्रधानता है. चुनाव ‘फेस’ से लड़े जाते हैं, ‘मूल्यों’ से नहीं. मूल्यों का अब अवमूल्यन हो गया है. फेस भी तो ‘फेक’ हो चला है. इसलिए न फेसबुक पर, जन्मे तो लाइक, मरे तो लाइक. अगर यहां विचार की थोड़ी भी काटा-काटी की तो शब्दों की गोली से छलनी कर दिये जाओगे. देश में विरोध करो, लेकिन फेसबुक पर अपने मित्रों का विरोध मत करो. वरना, अभिव्यक्ति की आजादी खतरे के निशान से ऊपर चली जायेगी. बिहार की राजनीति भी फेसबुक की स्टाइल में चलती है. कभी ‘उस’ फेस के साथ टैग किया तो आज ‘इस’ फेस के साथ. जो फेस कल तक ‘फेक’ लग रहा था, आज ऐसा फेस-वाॅश हुआ कि वही फेक-फेस ‘फ्रेश’ लगने लगा. जिस फ्रेंड को कल ‘ब्लाॅक’ किया, आज उसी के साथ ‘फ्रेंडशिप’ कुबूल हुआ. मतलब, राजनीति पर फेसबुक का भरपूर असर है. इसलिए, नेताओं को भी शेयर किया जा रहा है...!
बीच में टोकते हुए मैंने पूछा-मित्रवर, तब तो साहित्य और समाज को भी इसने प्रभावित किया होगा? उनको मानो नयी फ्रेंडशिप का किसी का रिक्वेस्ट मिल गया हो. तुरंत एक्सेप्ट करते हुए कहा-हां जी, साहित्य कभी समाज का दर्पण हुआ करता था, आज फेसबुक में इसका तर्पण हो गया. अब यह फेसबुक का साहित्य हो गया है. क्योंकि पूरा समाज फेसबुक पर मौजूद है. खेती-बारी से लेकर बुलेट ट्रेन तक. बच्चा से लेकर बूढ़ा तक. जन्म से लेकर मृत्यु तक. राम से रहीम तक. मोदी से लेकर ट्रंप तक. लालू से लेकर नीतीश तक. नख से लेकर सिर तक... और धरती से लेकर आसमान तक... पाताल तक. नेता-अभिनेता-जोकर से लेकर जुकरबर्ग तक.... साहित्यकार, जो कल तक छपने के लिए चप्पलें तोड़ता था, छापनेवालों के नखरे उठाता था... आज फेसबुक पर पोस्ट पर पोस्ट ठोके जा रहा है. यानी कि फेसबुकिया समाज तथा फेसबुकिया साहित्य. सब कुछ फेसबुकिया. पर, वास्तविकता यह है कि फेसबुक असली फेस है न बुक. असली भाई न मित्र. राम न असली रावण. देवी न असली देवता. सिर्फ टाइमपास है. मार्क जुकरबर्ग का दिमागी कमाल है. फेसबुक लाॅगइन करते हुए मैंने टाइमपास करना शुरू कर दिया. मित्र झोला टांगे चल दिये.

 
 
|
|
|
|
|
     
 


 
 
Visitor Count : http://www.hitwebcounter.com/
Designed by: Intrasoft Technology