Monday, April 06, 2015 10:39:27 PM
         
परिचय
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अभिमत
 
 
 

सवाल इकबाल का

अविनाश चन्द्र मिश्र

याद कीजिये! 2010 के विधानसभा चुनाव के दौरान सत्तारूढ़ राजग के एक विज्ञापन ने आमजन का ध्यान खूब खींचा था. वर्तमान संदर्भ में उसकी पुनः चर्चा समीचीन है. उस विज्ञापन में वर्णित था कि एक व्यक्ति रात के वक्त पटना से लखीसराय जाने के लिए घर से निकलता है तो खतरे की आशंका जता उसकी पत्नी उसे रोक देती है. पति जब बिहार के बदले हालात से उसे अवगत कराता है तब वह आश्वस्त होती है और पति को रात में घर से निकलने देती है. दरअसल, वह आतंक भरे जंगलराज वाले डेढ़ दशकीय कालखंड की प्रेतछाया से उबर नहीं पायी थी. बदल रहे बिहार की वास्तविकता जान सुकून मिला था. विज्ञापन में कोई अतिश्योक्ति या अतिरंजना नहीं थी. नीतीश कुमार के नेतृत्ववाली राजग सरकार के प्रथम सोपान में पटरी पर आयी विधि-व्यवस्था की सहज-सरल व स्वाभाविक अभिव्यक्ति-स्वीकृति थी. यह निर्विवाद है कि 2005 के नवम्बर में नीतीश कुमार ने जब चरमरायी शासनिक-प्रशासनिक व्यवस्था और बिहार की मुक्तिकामी छटपटाहट के बीच राज्य सत्ता की कमान संभाली थी तब कानून का राज कायम करने के सुनियोजित-समन्वित प्रयास हुए. उसी की अनुभूति सुशासन के रूप में हुई. पर, इसे बिहार का दुर्भाग्य कहें या बिहारवासियों का, सुशासन की वह अनुभूति दीर्घकाल तक बनी नहीं रह सकी. सत्ताजनित अहंकार और जाति आधारित राजनीतिक दुर्भावनाओं में घिर वह लुप्त हो गयी. धीरे-धीरे ही सही, असर यह हुआ कि कानून का राज लगभग धराशायी हो गया और बिहार फिर जंगलराज के मुहाने पर आ गया. आज हालात ऐसे बन गये हैं कि पत्नियां फिर पतियों को रात में घर से निकलने से रोकने लगी हैं, पति उन्हें आश्वस्त नहीं कर पा रहे हैं.

कानून का राज राजनीतिक नेतृत्व की नैतिकता और निष्पक्ष आचरण आधारित सत्ता के इकबाल से कायम होता है. जाति नहीं जमात की बात करने वाले नीतीश कुमार जब 2005 में सत्तासीन हुए थे तब वह वैसे गुणों के आगर थे. कानून को अपना काम करने देने के लिए राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त पुलिस प्रशासन, अपराधियों एवं सरगनाओं के खिलाफ भेदभाव रहित कार्रवाई, गंभीर मामलों की त्वरित सुनवाई, गवाहों की सुरक्षा और सजा दिलवाने में पुलिस की तत्परता से अपराध जगत में कानून का खौफ कायम हुआ और राज्य में सुशासन की बयार चल पड़ी. अपराध की बड़ी घटनाओं पर पुलिस मुख्यालय की गंभीरता, विधि-व्यवस्था की बाबत उसकी कठोरता, मामलों के अनुसंधान में अपेक्षित सक्रियता और आरोपितों की गिरफ्तारी में शीघ्रता से चतुर्दिक सत्ता का इकबाल दिखने लगा. लेकिन, अब वैसा कहीं कुछ नहीं है. वैसे, राजग सरकार के दूसरे सोपान से ही सत्ता के इकबाल की धमक और सुशासन की चमक मिटने लगी थी. महागठबंधन की सरकार में तो यह लगभग विलुप्त ही हो गयी. हालात ऐसे बन गये हैं कि लाख यतन के बावजूद नीतीश कुमार सुशासन की वह चमक फिर से कायम नहीं कर सकते हैं. यहां गंभीर सवाल है कि शासक वही, प्रशासक वही, शासन-प्रशासन तंत्र वही, तो फिर 2005 से पहले वाली अराजक स्थिति क्यों पैदा होने लगी है? इसके जातीय और राजनीतिक कारण तो हैं ही, शासन-प्रशासन में लंबे समय से कुछ खास चेहरों के ही काबिज रहने से उसमें जड़ता-सी आ गयी है. इस जड़ता को खत्म कर यानी लंबे समय से जमे चेहरों की जगह नये चेहरों को पदस्थापित कर सुशासन की नयी कल्पना की जा सकती है. नीतीश कुमार ऐसा कर पायेंगे क्या?
नीतीश कुमार नारी सशक्तीकरण का दम खूब भरते हैं, पर महिलाओं की अमानवीय यातना-प्रताड़ना और उत्पीड़न पर अंकुश लगाने में अक्षम-असमर्थ ही दिख रहे हैं. सरकार का आंकड़ा जो दर्शाता हो, बलात्कार और महिलाओं पर अत्याचार का अमानुषिक सिलसिला बना हुआ है. दिल्ली की दामिनी के साथ दरिंदगी से दग्ध सरकार ने महिलाओं को यौन उत्पीड़न-शोषण से त्राण दिलाने के लिए कड़े कानून बनाये. पर, उस कानून का भी दुष्कर्मियों-दुराचारियों में वैसा खौफ कायम नहीं हो पाया जैसा सरकार और उसके समर्थक-प्रशंसक समाजशास्त्रियों ने उम्मीद बांध रखी थी. यह कहने में संकोच नहीं कि नारी को वस्तु समझने की समाज की कुत्सित मानसिकता ने पूर्व के कानूनों की तरह इस बहुचर्चित सख्त कानून को भी असरहीन बना दिया है. अन्य प्रांतों की बात अपनी जगह है, बिहार में जघन्यतम यौन-अत्याचार की दुष्प्रवृत्ति वीभत्स रूप लेती दिख रही है. यौन कुंठा से ग्रस्त निष्ठुर-निर्दयी लोग निरीह मासूमों की इज्जत को क्षत-विक्षत कर प्राण तक हर ले रहे हैं. हाल के दिनों में हैवानियत की हद लांघ देने वाली हुई कई घटनाओं से डरी-सहमी महिलाएं-बालिकाएं घर हो या बाहर, हर जगह खुद को लाल आंखों से घिरी महसूस करती हैं. राज्य की पुलिस उन्हें इस भय से उबारने की बजाय अन्य संगीन अपराधों की तरह ऐसे मामलों को भी छिपाने की ही कोशिश करती है. अधिकतर मामलों को प्रेम-प्रसंग की दुखद परिणति बता उसकी गंभीरता को खत्म करने का उसका प्रयास होता है या फिर रफा-दफा करने के ख्याल से अधिसंख्य मामलों को महिला थानों के हवाले कर आरोपितों को दंडित कराने की जगह सुलह-समझौता पर ज्यादा जोर दिया जाता है. रसूखदारों से जुड़ा कोई मामला तूल पकड़ लेता है तो सत्ताशीर्ष और पुलिस मुख्यालय एसआईटी का गठन कर अपने कत्र्तव्य का इतिश्री मान इत्मीनान हो जाता है. पुलिस की इसी कार्यशैली से अपराधियों-दुष्कर्मियों में कानून का जो खौफ पैदा होना चाहिये वह नहीं हो पा रहा है. दुष्कर्म की दुष्प्रवृत्ति बढ़ रही है, निर्बल-असहाय महिलाएं उसकी चपेट में आ रही है, सरकार और समाज दर्शक की भूमिका में हैं.

 
 
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